बिहार और गुजरात चुनाव में ये पांच बातें हैं एक जैसी, जानें क्या

नई दिल्ली ,2014 में केंद्र में आने के बाद से बीजेपी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने कई राज्यों में चुनाव जीतकर सरकार बनाई. बीजेपी गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी नहीं होने के बावजूद वहां पर सरकार बनाने में कामयाब रही. वहीं जम्मू कश्मीर में विरोधी पार्टी के साथ हाथ मिलाकर जम्मू कश्मीर में पहली बार सरकार बनाने में कामयाब रही. हालांकि बीजेपी की अगुआई वाली एनडीए को दिल्ली, बिहार और पंजाब में करारी हार का सामना करना पड़ा.

अगर हम इन सभी चुनावों पर नजर डालेंगे तो बिहार का चुनाव अभी गुजरात हुए वर्तमान चुनाव से मिलता-जुलता प्रतीत होगा. आइए जानते हैं कि ऐसी कौन सी बातें हैं जो गुजरात चुनाव को 2015 बिहार चुनाव के करीब ले जाती हैं.

1. मुद्दे

बिहार और गुजरात दोनों विधानसभा चुनाव विकास के मुद्दे से शुरू होकर लड़े गए. बिहार में मोदी ने अपने 18 महीने के कार्यकाल को आगे रखकर वोट मांगा. साथ ही मोदी ने एनडीए सरकार का रोडमैप भी लोगों के सामने रखा. वहीं गुजरात में भी पीएम मोदी और अमित शाह ने भी गुजरात चुनाव की शुरुआत विकास दर और विकास से जुड़े दूसरे आंकड़ों को पेश कर वोट मांगा.

2. पार्टियों का नीचे गिरना

हालांकि तुरंत ही बिहार और गुजरात में राजनीतिक बहसबाजी का रूख विकास से हटकर दूसरी तरफ मुड़ गया. बिहार में नीचे गिरने की हद तक डीएन की बात होने लगी. यह सिलसिला मोदी के नीतीश कुमार के पॉलिटिकल डीएनए पर दिए गय बयान से शुरू हुआ था. इसके बाद नीतीश के समर्थकों ने बिहार के लोगों से बालों का सैंपल लाकर पीएमओ को भेजना शुरू कर दिया.

गुजरात में भी विकास के मुद्दों को छोड़कर कांग्रेस ने पीएम मोदी पर पर्सनल वर्बल अटैक शुरू कर दिए. उन्हें चाय बेचने वाला और नीच कहा गया. वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से भी उनके धर्म को लेकर बात पूछी गई. इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें जनेऊधारी हिंदू बताया. कांग्रेस ने इसके लिए पिक्चर भी जारी किए. कांग्रेस ने पीएम मोदी के मणीशंकर की घर पर हुए बैठक के संबंध पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर दिए गए बयान पर विरोध जताया.

3. बाहरी का मुद्दा

बिहार और गुजरात में एक चीज जो सबसे ज्यादा सामान था वह था आउटसाइडर और लोकल लीडर का मुद्दा. बिहार में नीतीश कुमार और आरजेडी लालू प्रसाद यादव ने यह मुद्दा उठाया था और मोदी और शाह पर बाहरी बोलकर अटैक किए थे.

वहीं गुजरात में भी मोदी ने खुद को इस मिट्टी का बेटा बताया और राहुल गांधी को इस मुद्दे पर टारगेट किया.

4. जाति

जाति राजनीति की बात करें तो गुजरात बिहार जैसा ही है. 14 प्रतिशत तक जाति आधारित वोट के पलटी होने से दोनों राज्यों के चुनाव पर असर पड़ता है. यादव जहां बिहार में निर्णायक भूमिका में होते हैं, वहीं गुजरात में पटेल इस रोल को अदा करती हैं. दोनों ही जाति अपने अपने राज्यों में 14 प्रतिशत आबादी तक मौजूद हैं.

जाति आधारित ग्रुप का बनना और जीत में उसकी भूमिका ने भी दोनों राज्यों के चुनाव में काफी महत्वपूर्ण रोल निभाया. जहां महादलित, मुस्लिम और यादवों गठबंधन ने जेडीयू और आरजेडी की जीत पक्की की.

वहीं गुजरात में कांग्रेस ने जाति आधारित राजनीति को आगे बढ़ाया और पटेल और क्षत्रियों को मिलाकर PaKsh (पक्ष) बनाया. गुजरात कांग्रेस के  भरतसिंह सौलंकी के पिता और पूर्व सीएम माधवसिंह सोलंकी ने 1985 में खाम (kham) की संरचना की थी. खाम यानी क्षत्रिय, हरिजन यानी दलित, आदिवासी और मुस्लिम.

इस फॉर्मुला ने राज्य में पाटिदारों की भूमिका गौण्य कर दी. इसने कुछ समय तक कांग्रेस को काफी फायदा पहुंचाया. सोलंकी की लीडरशीप में पार्टी ने 1985 में 182 सीट में से 149 पर कब्जा किया. हालांकि सोलंकी के इस कदम से पाटिदार कांग्रेस से हमेशा के लिए दूर हो गए और पाटिदारों की मदद से बीजेपी ने 1995 का चुनाव जीता और केशूभाई पटेल बीजेपी के पहले सीएम बनें.

5. सीएम का चेहरा

दोनों राज्यों में रूलिंग पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री के चेहरे को पहले ही सामने रख दिया था. जहां सीएम नीतीश कुमार महागठबंधन के चेहरे थे तो वहीं गुजरात में बीजेपी ने बिजय रूपाणी का नाम सीएम फेस के लिए रखा है. हालांकि बीजेपी साथ साथ पटेल और पाटिदारों को लुभाने के लिए डिप्टी सीएम नितिन पटेल का नाम भी लेती रही है. वहीं विपक्षी पार्टियां दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री का चेहरा चुनाव से पहले देने में नाकाम रहे हैं. बीजेपी और कांग्रेस बिहार और गुजरात में क्रमश: अपने सीएम की घोषणा नहीं की थी.

6. जीत

वहीं इतनी सामानत के साथ एक और समान बात इस चुनाव से जुड़ सकती है, वह है सत्ता में मौजूद पार्टी का दोबारा जीतना. जहां जेडीयू ने बिहार में सत्ता बरकरार रखी थी. एग्ज‍िट पोल से यह संकेत गुजरात के लिए भी मिल रहे हैं कि यहां बीजेपी सत्ता बरकरार रख सकती है. 18 दिसंबर को नतीजों से यह बात सामने आ जाएगी कि क्या दोनों राज्यों के चुनाव में एक और सामान बात जुड़ती है या नहीं.

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